मारे नोट पर दी गई कई प्रतिक्रियाओं पर प्रतिक्रिया: “दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में छात्रों द्वारा किए विरोध के संबध में”

जेसी कि उम्मीद थी, हमारे नोट “दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में छात्रों द्वारा  विरोध के संबध में” को कई उत्तेजित प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं. इससे हमें दो बातों का पता चलता है. एक, उस विशाल सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को समझने या स्वीकार करने के लिए कोई भी प्रयास नहीं किया गया है जिन्हें उठाने का प्रयास हमने किया है. दो, यह प्रतिक्रियाएं पहले उठाये गए मुद्दों के लिए एक तरह से प्रमाण हैं.

हमारे शुरुआती नोट में हमने दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग या डी.यू.डी.ई. (जैसा कि लिखा जाता है) के अपने उन छात्रों के लिए हमदर्दी व्यक्त की थी जो इस असफल चुनाव प्रक्रिया से पीड़ित हैं, जिसके लिए हम विभाग और विश्वविद्यालय को जिम्मेदार मानते हैं. लेकिन, इसके आलावा, हमने 3 मुद्दों को उठाया था. हमने केवल तीन अध्यापकों (जिनमे से दो एस.सी. और एस.टी. श्रेणी से हैं) पर ध्यान देने पर बहस की और चुनाव के पीछे बड़ी शक्तियों और प्रक्रियाओं पर ध्यान न दी जाने की छात्रों की अयोग्यता का विरोध किया. अंत में, हमने यह भी मुद्दा उठाया कि 1922 में विभाग की शुरुआत से ही जब डी.यू.डी.ई. के छात्रों का एक सामान्य समूह जातपात और इस्लाम के प्रति नफरत के विरुद्ध क्लासरूम में बोलता था तो वह आरक्षण के माध्यम से पहले एस.सी. और एस.टी. अध्यापकों को विभाग में लाने का लक्ष्य भी रखता था.

लेकिन, हमारे द्वारा उठाए गए मुद्दों को बेहद विरोध का सामना करना पड़ा. हमें “बिना आवश्यकता के एक खुले और बंद केस का राजनीतिकरण करने वाले”, “दबाने वालों को दबे हुए बताने वाले,” और छात्रों के विरोध के “मूल मुद्दे को हटाने वाले”  कहा गया, और हमें “छात्रों की शिकायतों पर अपने स्टैंड” को व्यक्त करने के लिए कहा गया. दूसरे शब्दों में हमें छात्रों को यह बताने के लिए कहा गया कि उन्हें अपने अच्छे, उदारवादी क्लासरुमों में लगाए गए नए अध्यापकों के साथ कैसे पेश आना चाहिए.

सबसे पहले, हम यह बताना चाहेंगे कि हमारा प्रयास छात्रों की शिकायतों को सुनना या विरोध की मांगों को पूरा करना और इसके हल देना नहीं था. हम उस विशेष मुद्दे पर टिप्पणी करने का प्रयास कर रहे थे जिसे इस विरोध द्वारा उठाया गया था. जैसा कि हमने पहले कहा है, समस्या चाहे कोई भी हो, इसे जैसे भी व्यक्त किया जा रहा है, शिकायत और विरोध दोनों ही स्पष्ट तौर पर डी.यू.डी.ई. में एकेडमिक स्पेस को दर्शाते हैं, तथाकथित ‘उदारवादी, सुधारवादी और प्रगतिशील.” फिर इन तीन अध्यापकों के गैर-विद्वतापूर्ण, जातिवाद, श्रेणीवाद, और इस्लाम के प्रति नफरत भरे इस नज़रिए को असहनीय बताया गया जिससे इस क्षेत्र को खतरा है. डी.यू.डी.ई. की पाठ्यचर्या  और क्लासरूम की इस गैर-समस्यावादी स्वीकृति को फिर से हमारे नोट के प्रति छात्रों और अध्यापकों की प्रतिक्रियाओं में पैदा किया गया. डी.यू. क्लासरूम को “बहस और संवाद का एक क्षेत्र” ही माना गया, जहाँ छात्रों के पास “बहस करने की, वह बातें बोलने की जिन्हें बाहर लगातार प्रतिबंधित किया जा रहा है, भाग लेने की” पूरी आजादी है. आओ विरोध करने वाले छात्रों को यह याद दिलाएं कि गुजर गए स्टेंडर्डज (चाहे उन्हें परिभाषित किया जा सकता है या किस उद्देश्य के लिए) को फिर से प्राप्त करने की कल्पना एंटी-मंडल प्रक्रिया की याद दिलाती है. इस तरह से यह प्रयास शैक्षिक संस्थाओं को “उत्कृष्टता के टापू” के रूप में सुरक्षित करने के लिए भी थी और आरक्षित छात्रों से बाहरी लोगों द्वारा “स्टैंडर्डज में गिरावट” का डर था.

इसके अलावा, ‘समस्या’ का ऐसा हल पूरी तरह से विशिष्ट-वर्ग समर्थकों से भरे दिल्ली विश्वविद्यालय विभाग, जो दशको से आरक्षित या गैर-विशिष्ट-वर्ग छात्रों के बिना चल रहा है,  में भरी हुई हिंसा को पूरी तरह से जायज़ बनाता है. असल में, आरक्षण की शक्तिपूर्ण पेशकश (90 के दशक में) के बाद भी डी.यू.डी.ई. ने क्लासरूम की पोस्ट-रिजर्वेशन और पोस्ट-मंडल निर्माण को संबोधित करने के लिए कोई परिवर्तन नहीं किया. भले ही विश्व में अंग्रेजी की शिक्षा बदल रही है, भले ही कई भारतीय विश्वविद्यालयों (उदाहरण के तौर पर हैदराबाद की सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी) में भी यह बदलाव आ रहे हैं, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय अब भी उसी पुराने ढर्रे  के सिलेबस को लागू कर रहा है, जिसका मुख्य भाग उपनिवेशवादी  और नस्लवादी  अंग्रेजी किताबों और उनके ‘’राष्ट्रवादी ‘’/(सवर्ण)जातिवादी भारतीय प्रतिभागी है. इन राष्ट्रवादी किताबों को अक्सर बिना किसी आलोचना के, जातिवाद पर बिना कोई ध्यान दिए पढ़ाया जाता है. यहाँ, जैसा कि हम में से कई लोग जानते हैं, हर  सवाल (यदि कोई है तो) वर्ग  और उत्तर औपनिवेशिक  विश्लेषण पर आधारित होता है और इसे एक श्वेत /सवर्ण नारी विमर्श  द्वारा जायज़ ठहराया जाता है. हमारे देश में जातिवाद और अन्य सामाजिक ढांचों के मुद्दों को केवल सतही तौर पर बताया जाता है और इन्हें सांकेतिक  क्षेत्रों में डाल दिया जाता है जहाँ इन पर केवल वही लोग खोज करेंगे जो इससे प्रभावित हुए हों या इसमें दिलचस्पी रखते हों.

अम्बेडकर रीडिंग ग्रुप में हम में से कई लोग जो अंग्रेजी साहित्य के छात्र और अध्यापक हैं ऐसे ही पाठ्यक्रम ,पाठ्यचर्या, वर्ग के  ढांचे से पीड़ित हैं. हम ऐसे नितांत  अजनबीकरण और भेदभाव को देखते हैं जिनका सामना ऐसे क्षेत्रों में पढ़ने या काम करने वाले अधिकारहीन छात्रों और अध्यापकों द्वारा किया जाता है जहाँ अभिजात पाठ्यक्रम , अभिजात अंग्रेजी, उच्च लेखन , मूल्यांकन और शैक्षिक उपकरणों का बोलबाला है.

इसके अलावा, विरोध करने वाले छात्र हमें बताते हैं कि हमारा विरोध प्रेरित है और यह एक “छोटा सा प्रयास है जिसका जन्म कड़वाहट और क्रोध से हुआ है.” जो अध्यापक फेसबुक पर इन छात्रों के सहयोग में खड़े हुए हैं वह भी सोचते हैं कि हम बिना आवश्यकता मुद्दे का राजनीतिकरण कर रहे हैं और एक एसी राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं जो “निहित स्वार्थो ”, उनके अनुसार “हास्यपूर्ण और राजनिनीक तौर पर नुकसानदेह”, पर आधारित है. संक्षेप में, भले ही छात्रों और उनके विरोध को पूरी तरह से जायज़ बताया गया है और इसे सहयोग मिला है, फिर भी विभिन्न नाकारात्मक विशेषणों का प्रयोग करके हमारे मुद्दों को ख़ारिज  किया जा रहा है.

यदि आज हमारे सभी मुद्दों को गलत, ‘असल मुद्दे’ की गैर-आवश्यक विफलता, मान कर हटा दिया जाए तो हम एक ऐसे क्षेत्र की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ बाकी सब मुद्दों को हटाने के लिए कुछ लोगों के मुद्दों को पहल दी जाती है और जायज़ ठहराया जाता है. हमें यह कहते हुए बहुत अफ़सोस हो रहा है कि यह मंडलविरोधी  अभियान  की अनन्य , अभिजातवादी  और पुरातनपंथी  राजनीति की एक पुनरभिपुष्टि के अलावा कुछ नहीं है.

इसी तरह से हमारे नोट के लिए मिली विभिन्न प्रतिक्रियाओं में हमें बार-बार यही कहा गया:

Ø  “जिन अध्यापकों की हमने शिकायत की है हमने उनकी जाति को कही भी नहीं दर्शाया है.”

Ø  “कुछ शिकायतें एस.सी. अध्यापकों के खिलाफ भी हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि यह एस.सी. अध्यापकों की श्रेणी के खिलाफ हैं.”

Ø  “हम यह पूरे यकीन के साथ कह सकते हैं कि इन अध्यापकों ने कक्षा में कभी भी भेदभाव  का सामना नहीं किया होगा.”

Ø  हस्ताक्षर करने वाले छात्र विभिन्न पहचानों वाले हैं (और वह सभी उच्च श्रेणी से नहीं हैं)

Ø  “मैं कोई जातिवादी नहीं हूँ”

Ø  “वह कोई जातिवादी नहीं हैं”

दुसरे शब्दों में, यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि इस मुद्दे को जातिवाद का रूप देने के लिए एक उत्साहपूर्ण विरोध हो रहा है. इस रूप को मुद्दे के लिए गलत समझा गया है और इसे बिना किसी सोच-विचार के रद्द कर दिया है. आज हिंदुस्तान टाइम्ज़ की रिपोर्ट, जिसने गलत ढंग से छात्रों की प्रतिक्रियाओं को आलोचकों तक पहुँचाया (हमारी स्थिति या नोट के बारे में बताए बिना ही), की यह हेडलाइन है: अध्यापकों के विरुद्ध शिकायतें जातिवाद पर आधारित नहीं है, डी.यू. छात्र

हम विरोध करने वाले छात्रों को यह बताना चाहेंगे कि यह अस्वीकृति वह आधार है जिस पर भारतीय समाज और शिक्षा क्षेत्र में जातिवाद का विकास होता है. न केवल हमारे कक्षा, शिक्षा, पाठ्यक्रम , तरीके, उदाहरण, ज्ञानमीमांसा, शरीर, कपडे, लहजे, दोस्त, दिलचस्पियां और हमारी किताबें श्रेणी से, द्वारा और के लिए ही (विभिन्न पॉवर स्ट्रक्चरज के साथ मिलकर) बनती हैं, हमने इसे देखने या इसके बारे में बात करने की अयोग्यता का बहुत ही चालाकी से निर्माण कर लिया है. तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि जब एक दलित आदिवासी बहुजन माइनोरिटीज़ कलेक्टिव उन मुद्दों को सबके सामने लाने का प्रयास करती है जिन्हें सब छुपा ही रहने देना कहते हैं, तब एसी उत्तेजित अस्वीकृति होती ही है.

इसके अलावा, जातिवाद को इसके पुराने और खुले हिंसक रूप दे कर, जैसे कि “अध्यापक की जाति को जानना”, “जानबूझ कर उन्हें अयोग्य महसूस करवाना”, खुले में “भेदभाव करना” या जैसे कि एक अध्यापक ने प्रतिक्रिया दी है “जाति के आधार पर विभिन्न नामों से बुलाना”, हम एकेडमी के श्रेणीवाद ढांचे के बारे में जो भी बोलते हैं उसे नकारने के लिए हमेशा से कोई न कोई प्रयास रहा है. आपको यह जानकार बहुत हैरानी होगी कि वह लोग भी इस ढांचे को सामान्यता से लेते हैं जो श्रेणी, उत्तरऔपनिवेशिक  मुद्दों या लिंग आधारित समस्यायों में इन मुद्दों का कई गुना ज्यादा सामना करते हैं.

यह मुद्दा तब और स्पष्ट हो जाता है जब विरोध करने वाले छात्रों द्वारा उनको मिली प्रतिक्रियाओं के संबंध में और मुद्दों को उठाते हुए देखते हैं. छात्रों का यह मानना है कि उन्हें पता है कि “माइनोरिटी समूह के लोगों को शिक्षा और अन्य अवसरों तक पहुँचने के लिए कैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है”. लेकिन, यह छात्र यह भी बताते हैं कि उनका “विचार यह बिलकुल नहीं है कि किसी विशेष जाति से संबंध रखने का अर्थ यह नहीं होता कि वह जाति आपकी पेशवर योग्यता को निर्धारित करती है.” इसी तरह से, छात्र यह नहीं चाहते कि हम ज्ञान और सामाजिक इतिहास, बुद्धि और इतिहासिक स्थान के बीच कोई संबंध बनाएं. (हिंदुस्तान टाइम्ज़ ने भी छात्रों के इन वाक्यों को पेश किया है). वह मानते हैं कि इस तरह का संबंध पिछड़ी  जातियों में मौजूद “बुद्धि” का अपमान होगा. इन जातियों में अध्यापकों की कोई कमी नहीं है और वह सब “समय के पाबंद हैं” और वह “बेहतरीन कोचिंग और बौद्धिक शिक्षा” प्रदान करते हैं.

दूसरे शब्दों में, शिक्षा के क्षेत्र में, जिसमें विभिन्न श्रेणियों के छात्र जाते हैं, वहां जाति या अन्य मुद्दों से संबंधित कोई भी भेदभाव नहीं होना चाहिए. यहाँ, “विशेषता”, “बुद्धि”, और “ज्ञान” को जाति से नहीं जोड़ा जाता और ऊँची और नीची जाति के लोग इससे प्राप्त कर सकते हैं. यकीनन मेधाविमर्श  का ज्वलंत  उदाहरण यही है. यह मेधाविमर्श मंडलविरोधी  समय में भी विकास करता है, जहाँ किसी के गुण को उसकी जाति के साथ नहीं जोड़ा जाता और ऐसे संबंधो को नकारा जाता है और शैक्षिक गुणों – ज्ञान, बुद्धि – को जाति से नहीं जोड़ा जाता. यह एक एसी स्थिति है जिसने इस तरह कि नारों को जन्म दिया जैसे कि: “ज्ञान को कमज़ोर न बनाओ,” जिसे दिल्ली में मंडल कमिशन का विरोध करने वाले मेडिकोज द्वारा विकसित किया गया था. इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है, बल्कि बदकिस्मती है, कि दिल्ली विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण क्षेत्र को आज भी –आरक्षणविरोधी  विचार रखने वालों द्वारा चलाया जाता है.

अंत में, एक बार फिर से यह स्पष्ट करते हैं कि हम विरोध के हक में या विरोध में नहीं हैं. हम एक पूरी तरह से अलग मुद्दा पेश कर रहे हैं जो दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रजी विभाग के अधिकारहीन लोगों के जीवन के अनुभव पर आधारित है. हमारे लिए छात्रों का विरोध केवल विभाग के अंदर का विरोध है जो, विरोधियों के दावे से अलग, एक जातिवाद और इस्लाम के प्रति नफरत से भरे एकेडमिया के अंदर की असली समस्याओं का कोई विरोध नहीं करेगा.

असल में, हमें यह लगता है कि तीन नए अध्यापकों (जिनमें से दो आरक्षित श्रेणियों से हैं) की विरोधी टिप्पणियों और शैक्षिक योग्यताओं का विरोध, जो उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के संपूर्णता और बेहतरी  के लिए एक खतरा बनाता है, इससे जुड़े हुए लोगों को नुकसान पहुँचाने के अलावा और कुछ नहीं करेगा. 

(THE POST WAS RELEASED DURING THE LAST WEEK OF OCTOBER 2014)

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